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mahabharat 13.112.10-11: जो मनुष्य बहुत सी स्वर्ण दक्षिणा सहित इन्द्रप्रिय यज्ञ का अनुष्ठान करता है, सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, निर्दोष, क्षमाशील, समस्त इन्द्रियों से मुक्त और क्रोध को जीतने वाला होता है, वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 13.112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 112: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  13.112.10-11 
यज्ञं बहुसुवर्णं वा वासवप्रियमाचरेत्॥ १०॥
सत्यवान् दानशीलश्च ब्रह्मण्यश्चानसूयक:।
क्षान्तो दान्तो जितक्रोध: स गच्छति परां गतिम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य बहुत सी स्वर्ण दक्षिणा सहित इन्द्रप्रिय यज्ञ का अनुष्ठान करता है, सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, निर्दोष, क्षमाशील, समस्त इन्द्रियों से मुक्त और क्रोध को जीतने वाला होता है, वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।
 
One who performs the rituals of Indrapriya Yagya with lots of gold dakshina and is truthful, charitable, a devotee of Brahmins, blameless, forgiving, free from all senses and conqueror of anger, he attains the best path.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)