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mahabharat 13.111.41-43h: जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रतिदिन दो बार भोजन करके जीवित रहता है तथा अहिंसा, सत्य और संयम का पालन करता है, वह वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है और दस हजार वर्षों तक स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है।   |   mahabharat अध्याय 13.111: मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 111: मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन  »  श्लोक 41-43h
 
 
श्लोक  13.111.41-43h 
यस्तु संवत्सरं पूर्णं चतुर्थं भक्तमश्नुते॥ ४१॥
अहिंसानिरतो नित्यं सत्यवाग् विजितेन्द्रिय:।
वाजपेयस्य यज्ञस्य स फलं समुपाश्नुते॥ ४२॥
दशवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रतिदिन दो बार भोजन करके जीवित रहता है तथा अहिंसा, सत्य और संयम का पालन करता है, वह वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है और दस हजार वर्षों तक स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है।
 
He who survives on two meals every two days for a whole year and also practices non-violence, truth and self-control obtains the fruits of the Vajapeya sacrifice and is established in the heaven for ten thousand years.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)