श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक d8h-112
 
 
श्लोक  13.109.d8h-112 
वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि।
(कुलीन: पण्डित इति रक्ष्या नि:स्वा: स्वशक्तित:।)
गृहे वासयितव्यास्ते धन्यमायुष्यमेव च॥ ११२॥
 
 
अनुवाद
यदि वृद्ध सम्बन्धी, निर्धन मित्र तथा कुलीन विद्वान दरिद्र हों, तो यथाशक्ति उनकी रक्षा करनी चाहिए। उन्हें अपने घर ठहराना चाहिए। इससे धन और आयु की वृद्धि होती है ॥112॥
 
If old relatives, poor friends and noble scholars are poor, they should be protected to the best of our ability. They should be made to stay at our homes. This increases wealth and longevity. ॥ 112॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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