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mahabharat 13.109.d4-d5: विद्वान पुरुष को विवाह से पहले संभोग नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ने का दोषी माना जाता है। ऐसी स्थिति में उसे पश्चाताप करना चाहिए। उसने न तो किसी अन्य स्त्री की ओर देखा और न ही उसके साथ एकांत में आसन पर बैठा। अपनी इंद्रियों को सदैव अपने वश में रखो। स्वप्न में भी मन पवित्र रखो।   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक d4-d5
 
 
श्लोक  13.109.d4-d5 
(दारसंग्रहणात् पूर्वं नाचरेन्मैथुनं बुध:।
अन्यथा त्ववकीर्ण: स्यात् प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥
नोदीक्षेत् परदारांश्च रहस्येकासनो भवेत्।
इन्द्रियाणि सदा यच्छेत् स्वप्ने शुद्धमना भवेत्॥ )
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष को विवाह से पहले संभोग नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ने का दोषी माना जाता है। ऐसी स्थिति में उसे पश्चाताप करना चाहिए। उसने न तो किसी अन्य स्त्री की ओर देखा और न ही उसके साथ एकांत में आसन पर बैठा। अपनी इंद्रियों को सदैव अपने वश में रखो। स्वप्न में भी मन पवित्र रखो।
 
A learned man should not have sexual intercourse before marriage, otherwise he is considered guilty of breaking the vow of celibacy. In such a situation he should repent. He neither looked at another woman nor sat on a seat with her in private. Always keep your senses under your control. Remain pure in mind even in dreams.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)