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श्लोक 13.109.d12  |
(य इमं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
स शुभान् प्राप्नुते लोकान् सदाचारव्रतान्नृप॥ ) |
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| अनुवाद |
| हे मनुष्यों के स्वामी! जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनता और सुनाता है, वह सदाचाररूपी व्रत के प्रभाव से शुभ लोकों को प्राप्त होता है। |
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| O lord of men! One who listens to and narrates this episode every day, goes to the auspicious worlds due to the effect of the vow of good conduct. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आयुष्याख्याने चतुरधिकशततमोऽध्याय:॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आयु बढ़ानेवाले साधनोंका वर्णनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०४॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १६५ १/२ श्लोक हैं) |
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