श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक d10h-129
 
 
श्लोक  13.109.d10h-129 
(सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषत:।)
परिवादं न च ब्रूयात् परेषामात्मनस्तथा।
परिवादो ह्यधर्माय प्रोच्यते भरतर्षभ॥ १२९॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! पुण्यात्मा, वृध्द, वृद्धजन तथा विशेषतः कुल की स्त्रियों की, दूसरों की अथवा अपनी भी निन्दा न करो; क्योंकि निन्दा पाप का कारण कही गई है॥ 129॥
 
O best of the Bharatas! Do not criticise the virtuous, the elders, the elderly and especially the women of good family, others or even yourself; because criticising is said to be the cause of sin.॥ 129॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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