श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  13.109.81 
सम्यङ्मिथ्याप्रवृत्तेऽपि वर्तितव्यं गुराविह।
गुरुनिन्दा दहत्यायुर्मनुष्याणां न संशय:॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
यदि गुरु तुम्हारे प्रति प्रतिकूल व्यवहार भी करें, तो भी उनके प्रति अच्छा व्यवहार करना उचित है; क्योंकि गुरु की निन्दा करने से मनुष्य का जीवन नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥81॥
 
Even if the Guru behaves unfavorably towards you, it is still appropriate to behave well towards him; because criticizing the Guru ruins the life of a man, there is no doubt about it. ॥ 81॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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