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mahabharat 13.109.78-79: क्रोध में भरा हुआ सर्प जहाँ तक दृष्टि जाती है, वहाँ तक आक्रमण करता है और काटता है। क्षत्रिय भी जब क्रोधित होता है, तो अपनी पूरी शक्ति से अपने शत्रु को जलाकर भस्म कर देता है; किन्तु जब ब्राह्मण क्रोधित होता है, तो वह अपनी दृष्टि और विचारों से अपमान करने वाले के सम्पूर्ण कुल को भस्म कर देता है; इसलिए बुद्धिमान पुरुष को इन तीनों की सेवा बड़े यत्न से करनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 78-79
 
 
श्लोक  13.109.78-79 
दहत्याशीविष: क्रुद्धो यावत् पश्यति चक्षुषा।
क्षत्रियोऽपि दहेत् क्रुद्धो यावत् स्पृशति तेजसा॥ ७८॥
ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद् ध्यानेनावेक्षितेन च।
तस्मादेतत् त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डित:॥ ७९॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में भरा हुआ सर्प जहाँ तक दृष्टि जाती है, वहाँ तक आक्रमण करता है और काटता है। क्षत्रिय भी जब क्रोधित होता है, तो अपनी पूरी शक्ति से अपने शत्रु को जलाकर भस्म कर देता है; किन्तु जब ब्राह्मण क्रोधित होता है, तो वह अपनी दृष्टि और विचारों से अपमान करने वाले के सम्पूर्ण कुल को भस्म कर देता है; इसलिए बुद्धिमान पुरुष को इन तीनों की सेवा बड़े यत्न से करनी चाहिए।
 
A serpent filled with rage attacks and bites as far as the eyes can see. A Kshatriya too, when enraged, tries to burn his enemy to ashes with all his might; but when a Brahmin is enraged, he burns the entire clan of the person insulting him with his sight and thoughts; therefore a wise man should serve these three with great diligence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)