श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 66-67h
 
 
श्लोक  13.109.66-67h 
न चासीतासने भिन्ने भिन्नकांस्यं च वर्जयेत्॥ ६६॥
नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्न: स्नातुमर्हति।
 
 
अनुवाद
फटी हुई चटाई पर न बैठें। टूटी हुई पीतल की थाली का प्रयोग न करें। केवल एक वस्त्र (धोती) पहनकर भोजन न करें (साथ में तौलिया रखें)। नंगे न नहाएँ।
 
Do not sit on a torn mat. Do not use a broken brass plate. Do not eat wearing only one piece of clothing (a dhoti) (carry a towel along with it). Do not bathe naked. 66 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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