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mahabharat 13.109.58: (मन से) अग्नि को स्पर्श करके जल को समस्त इन्द्रियों, समस्त अंगों, नाभि और दोनों हथेलियों को स्पर्श करना चाहिए ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.109.58 
अग्निमालभ्य तोयेन सर्वान् प्राणानुपस्पृशेत्।
गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितले तथा॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
(मन से) अग्नि को स्पर्श करके जल को समस्त इन्द्रियों, समस्त अंगों, नाभि और दोनों हथेलियों को स्पर्श करना चाहिए ॥58॥
 
(With the mind) After touching the fire, the water should touch all the senses, all the organs, the navel and both the palms. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)