श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.109.56 
प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद् वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्।
प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
भोजन करने वाले व्यक्ति को पूर्व दिशा की ओर मुख करके मौन रहकर भोजन करना चाहिए। भोजन करते समय उसे परोसे गए भोजन की निंदा नहीं करनी चाहिए। थाली में थोड़ा भोजन छोड़ देना चाहिए और भोजन करने के बाद मन में अग्नि का स्मरण करना चाहिए।
 
The person eating food should face east and eat in silence. While eating food, he should not criticize the food served. Leave some food on the plate and after eating, remember Agni in his mind. 56.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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