श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.109.33 
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम्।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
बाणों से छेदा हुआ या कुल्हाड़ी से काटा हुआ वन पुनः उग आता है, किन्तु कठोर वचनों के शस्त्र से किया गया भयंकर घाव कभी नहीं भरता ॥ 33॥
 
A forest pierced by arrows or cut down by an axe sprouts again, but a terrible wound inflicted by the weapon of harsh words never heals. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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