श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  13.109.152 
यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणै:।
अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप॥ १५२॥
 
 
अनुवाद
अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा सहित विविध यज्ञ करने चाहिए। हे मनुष्यों के स्वामी! गृहस्थ जीवन की अवधि समाप्त होने पर वानप्रस्थ नियमों का पालन करते हुए वन में रहना चाहिए॥ 152॥
 
According to one's capacity one should perform various sacrifices with dakshina. O Lord of men! After the period of domestic life is over one should live in the forest following the rules of Vanaprastha.॥ 152॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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