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mahabharat 13.109.145-146: नरेश्वर! क्षत्रियों को धनुर्वेद और वेदों के अध्ययन के लिए प्रयत्न करना चाहिए। राजेन्द्र! तुम्हें हाथी-घोड़े की सवारी और रथ चलाने की कला में निपुणता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि जो पुरुष प्रयत्न करता है, वह सुखपूर्वक उन्नति करता है। वह अपने शत्रुओं, बन्धुओं और सेवकों के लिए दुःखी हो जाता है। 145-146॥   |   mahabharat अध्याय 13.109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 145-146
 
 
श्लोक  13.109.145-146 
धनुर्वेदे च वेदे च यत्न: कार्यो नराधिप।
हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह॥ १४५॥
यत्नवान् भव राजेन्द्र यत्नवान् सुखमेधते।
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च॥ १४६॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! क्षत्रियों को धनुर्वेद और वेदों के अध्ययन के लिए प्रयत्न करना चाहिए। राजेन्द्र! तुम्हें हाथी-घोड़े की सवारी और रथ चलाने की कला में निपुणता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि जो पुरुष प्रयत्न करता है, वह सुखपूर्वक उन्नति करता है। वह अपने शत्रुओं, बन्धुओं और सेवकों के लिए दुःखी हो जाता है। 145-146॥
 
Nareshwar! Kshatriyas should strive for Dhanurveda and Veda study. Rajendra! You should strive to gain proficiency in the art of elephant-horse riding and chariot driving, because a man who makes efforts progresses happily. He becomes miserable for his enemies, relatives and servants. 145-146॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)