श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  13.109.144 
मातु: पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम्।
हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ॥ १४४॥
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! माता-पिता और गुरुजनों की आज्ञा का तुरन्त पालन करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि उनकी आज्ञा लाभदायक है या हानिकारक।
 
Narashrestha! The orders of parents and teachers should be followed immediately. One should not think about whether their orders are beneficial or harmful.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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