श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  13.109.133 
अपस्मारिकुले जातां निहीनां चापि वर्जयेत्।
श्वित्रिणां च कुले जातां क्षयिणां मनुजेश्वर॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जो मृगी से दूषित कुल में उत्पन्न हुआ हो, नीच स्वभाव का हो, श्वेत कुष्ठ या क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति के कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसे भी त्याग देना चाहिए ॥133॥
 
O Lord of men! One who is born in a family contaminated with epilepsy, is of a lowly nature, is born in a family of a person suffering from white leprosy or tuberculosis should also be abandoned. ॥133॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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