श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 125-126
 
 
श्लोक  13.109.125-126 
शिर:स्नातोऽथ कुर्वीत दैवं पित्र्यमथापि च॥ १२५॥
नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिन् जातो भवेन्नर:।
न प्रोष्ठपदयो: कार्यं तथाग्नेये च भारत॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
भारत में सिर से स्नान करके देवता और पितरों का कार्य करें। जिस नक्षत्र में जन्म हुआ हो, उस नक्षत्र में, पूर्वा और उत्तरा भाद्रपद दोनों में तथा कृत्तिका नक्षत्र में भी श्राद्ध निषिद्ध है। 125-126॥
 
India After taking bath from the head, do the work of God and ancestors. Shraddha is prohibited in the Nakshatra in which one was born, in both Purva and Uttara Bhadrapadas and also in Krittika Nakshatra. 125-126॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas