श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  13.109.105 
परापवादं न ब्रूयान्नाप्रियं च कदाचन।
न मन्यु: कश्चिदुत्पाद्य: पुरुषेण भवार्थिना॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे दूसरों की निन्दा नहीं करनी चाहिए, अप्रिय वचन नहीं बोलने चाहिए और किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए ॥105॥
 
A person who wants his own well-being should not criticise others, say unpleasant words, and should not anger anyone. ॥ 105॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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