श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  13.109.104 
अङ्गुष्ठस्य च यन्मध्यं प्रदेशिन्याश्च भारत।
तेन पित्र्याणि कुर्वीत स्पृष्ट्वापो न्यायत: सदा॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
भारतवर्ष में अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग को पितृतीर्थ कहते हैं। शास्त्रों में बताए अनुसार सदैव जल ग्रहण करके ही पितृकर्म करना चाहिए। 104॥
 
India The middle part of the thumb and forefinger is called Pitrutirtha. One should always do ancestral work by taking water as prescribed in the scriptures. 104॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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