श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  13.109.103 
अंगुष्ठस्यान्तराले च ब्राह्मं तीर्थमुदाहृतम्।
कनिष्ठिकाया: पश्चात् तु देवतीर्थमिहोच्यते॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
अँगूठे के अन्तर (मूल स्थान) को ब्रह्मतीर्थ, कनिष्ठिका आदि अँगुलियों के पृष्ठ भाग (ललाट) को देवतीर्थ कहते हैं ॥103॥
 
The gap (root place) of the thumb is called Brahmatirtha, the back part (forehead) of the little finger etc. fingers is called Devtirtha. 103॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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