श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  13.109.102 
अद्भि: प्राणान् समालभ्य नाभिं पाणितले तथा।
स्पृशंश्चैव प्रतिष्ठेत न चाप्यार्द्रेण पाणिना॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद जल से अपनी आँखें, नाक आदि और नाभि को स्पर्श करें और फिर दोनों हाथों की हथेलियों को धो लें। धोने के बाद गीले हाथों के साथ न बैठें (उन्हें कपड़े से पोंछकर सुखा लें)।॥102॥
 
After this, touch your eyes, nose, etc. and navel with the water and then wash the palms of both hands. After washing, do not sit with wet hands (wipe them with a cloth and dry them).॥102॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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