श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  13.109.101 
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वा चाग्निं समाहित:।
ज्ञातिश्रैष्ठ्यमवाप्नोति प्रयोगकुशलो नर:॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
फिर कुशल पुरुष को एकाग्र होकर अपने सिर पर हाथ रखना चाहिए। तत्पश्चात मन से अग्नि का स्पर्श करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपने परिवार के सदस्यों में श्रेष्ठता प्राप्त करता है।॥101॥
 
Then the skilled person should concentrate and place his hand on his head. After that he should touch the fire with his mind. By doing this he achieves superiority among his family members.॥101॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas