श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 109: आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.109.10 
अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम्।
भूतिकर्माणि कुर्वाणं तं जना: कुर्वते प्रियम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति धर्म का आचरण करता है और लोक-कल्याण के कार्यों में लगा रहता है, उसे यदि कोई न भी देखे, तो भी उसका नाम सुनकर ही लोग उससे प्रेम करने लगते हैं ॥10॥
 
Even if one does not see the person who practices religion and is engaged in works for the welfare of the people, people start loving him merely by hearing his name. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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