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श्लोक 13.107.63  |
इदं य: शृणुयान्नित्यं य: पठेद्वा जितेन्द्रिय:।
स याति ब्रह्मणो लोकं ब्राह्मणो गौतमो यथा॥ ६३॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनता है, अथवा इसका पाठ करता है, वह जितेन्द्रिय होकर गौतम ब्राह्मण के समान ब्रह्मलोक को जाता है ॥63॥ |
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| The man who listens to this incident every day, or recites it, being a Jitendriya, will go to Brahmalok like Gautam Brahmin. 63॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हस्तिकूटो नाम द्वॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १०२॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०२॥
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