| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख » श्लोक 49-51 |
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| | | | श्लोक 13.107.49-51  | गौतम उवाच
यत्र शीतभयं नास्ति न चोष्णभयमण्वपि।
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दु:खं न सुखं तथा॥ ४९॥
न द्वेष्यो न प्रिय: कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथा।
न जरामरणे तत्र न पुण्यं न च पातकम्॥ ५०॥
तस्मिन् विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते।
स्वयम्भुभवने पुण्ये हस्तिनं मे प्रदास्यसि॥ ५१॥ | | | | | | अनुवाद | | गौतम बोले, "आपको यह हाथी मुझे उस ब्रह्मलोक में लौटाना होगा, जहाँ शीत का भय नहीं है, जहाँ तनिक भी गर्मी का भय नहीं है, जहाँ न भूख है, न प्यास, जहाँ न पश्चाताप है, न हर्ष है, न शोक, जहाँ न कोई द्वेष का पात्र है, न प्रेम का, जहाँ न कोई मित्र है, न शत्रु, जहाँ न बुढ़ापा है, न मृत्यु, न पुण्य है, न पाप, उस ब्रह्मलोक में जो रजोगुण से रहित, समृद्ध है, बुद्धि और सत्व से युक्त है तथा सद्गुणों से परिपूर्ण है।" | | | | Gautama said, "You will have to return this elephant to me in that Brahmaloka where there is no fear of cold, where there is no fear of even the slightest degree of heat, where there is neither hunger nor thirst, where there is neither remorse nor joy or sorrow, where no one is the object of hatred or love, where there is no friend or enemy, where there is no old age or death, no virtue or sin, in that Brahmaloka which is devoid of Rajoguna, is prosperous, is endowed with wisdom and Sattva and is full of virtues." | | ✨ ai-generated | | |
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