श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  13.107.43-44 
धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतद: समां समां
गवां शती दश दद्याच्च शक्त्या।
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां
पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम्॥ ४३॥
ये जीर्यन्ते ब्रह्मचर्येण विप्रा
ब्राह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव।
मनस्विनस्तीर्थयात्रापरायणा-
स्ते तत्र मोदन्ति गवां निवासे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "जो एक हजार गौओं का स्वामी हो और प्रतिवर्ष सौ गौओं का दान करता हो, जो सौ गौओं का स्वामी हो और अपनी शक्ति के अनुसार दस गौओं का दान करता हो, जिसके पास केवल दस गौएँ हों, यदि वह उनमें से एक गौ दान करे अथवा जो दानशील मनुष्य पाँच गौओं में से एक गौ दान करे, वह गोलोक को जाता है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वृद्ध होते हैं, जो वेदों के वचनों की सदैव रक्षा करते हैं तथा जो बुद्धिमान ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, वे ही गौओं के धाम गोलोक में सुख भोगते हैं।
 
Dhritarashtra said, "He who owns a thousand cows and donates a hundred cows every year, he who owns a hundred cows and donates ten cows as per his capacity, he who has only ten cows, if he donates one cow from among them or a charitable man who donates one cow from among five cows, he goes to Golok. Those Brahmins who grow old by observing celibacy, those who always protect the words of the Vedas and those wise Brahmins who are always ready for pilgrimage, they alone enjoy the bliss in Golok, the abode of cows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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