श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.107.41 
धृतराष्ट्र उवाच
ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता
धर्मात्मानो रक्षितार: प्रजानाम्।
ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगा-
स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - मुने ! जो पुण्यात्मा राजा राजसूय यज्ञ में अभिषिक्त होते हैं, जो अपनी प्रजा की रक्षा करते हैं और जिनके सम्पूर्ण अंग अश्वमेध्य यज्ञ के स्नान से भीग जाते हैं, उनके लिए प्रजापति का लोक ही है। धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जाएँगे ॥41॥
 
Dhritarashtra said – Mune! Those virtuous kings who are anointed in the Rajasuya Yagya, who protect their subjects and whose entire body parts get drenched in the bath of Ashwamedhya Yagya, are the world of Prajapati for them. Dhritarashtra will not go there either. 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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