श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  13.107.38 
गौतम उवाच
इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका
दुरन्वया: काङ्क्षिता मानवानाम्।
तस्याहं ते भवने भूरितेजसो
राजन्निमं हस्तिनं यातयिष्ये॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "हे राजन! इन्द्र के लोक राग और शोक से रहित हैं। उन्हें प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। सभी मनुष्य उन्हें प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। मैं उन परम तेजस्वी इन्द्र के महल में जाकर आपसे यह हाथी वापस ले लूँगा।" 38.
 
Gautama said, "O King! The worlds of Indra are free from passion and sorrow. It is very difficult to attain them. All men desire to attain them. I will go to the palace of that very glorious Indra and take back this elephant from you." 38.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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