श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  13.107.36-37 
धृतराष्ट्र उवाच
चातुर्मास्यैर्ये यजन्ते जना: सदा
तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति।
ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना
यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्रा:॥ ३६॥
सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां
यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम्।
धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, 'जो लोग सदैव चातुर्मास्य यज्ञ करते हैं, हजारों इष्टीय अनुष्ठान करते हैं और जो ब्राह्मण वैदिक विधि से तीन वर्षों तक प्रतिदिन भक्तिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्म का भार भली-भाँति वहन करते हैं, वैदिक मार्ग पर भली-भाँति स्थित हैं, वे ही पुण्यात्मा एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण वरुणलोक को जाते हैं। धृतराष्ट्र को वहाँ भी जाने की आवश्यकता नहीं है। वह उससे भी उत्तम लोक को प्राप्त होगा।' 36-37।
 
Dhritarashtra said, "Those who always perform the Chaturmasya Yagya, perform thousands of Ishtiya rituals and those Brahmins who perform Agnihotra with devotion every day for three years according to the Vedic method, bear the burden of religion well, are well established on the Vedic path, only those virtuous and great Brahmins go to Varunlok. Dhritarashtra does not have to go there either. He will attain a world even better than that. 36-37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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