श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.107.35 
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोका: सनातना:
सुपुण्यगंधा विरजा विशोका:।
वरुणस्य राज्ञ: सदने महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "इसके अतिरिक्त और भी बहुत से सनातन लोक हैं, जो प्रकाशित हैं, जहाँ शुद्ध सुगन्ध व्याप्त है। वहाँ न तो रजोगुण है, न शोक। वे स्थान महामनस्वी राजा वरुण के लोक में हैं। मैं वहाँ जाकर तुमसे अपना हाथी वापस ले लूँगा।" 35।
 
Gautama said, "Apart from that, there are many other eternal worlds that are lit up, where pure fragrance prevails. There is neither Rajoguna nor sorrow. Those places are in the world of the great-minded king Varuna. I will go there and take back my elephant from you. 35.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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