श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.107.32 
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोका: सनातना
विरजसो वितमस्का विशोका:।
आदित्यदेवस्य पदं महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले- राजन! सोमलोक से ऊपर अनेक सनातन लोक हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और दुःख से रहित हैं। वे महान सूर्यदेव के निवास स्थान हैं। मैं वहाँ जाकर आपसे अपना हाथी ले लूँगा।
 
Gautam said- King! There are many eternal worlds above Somloka, which are free from Rajoguna, Tamoguna and sorrow. They are the abodes of the great Sun God. I will go there and collect my elephant from you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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