| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख » श्लोक 30-31 |
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| | | | श्लोक 13.107.30-31  | धृतराष्ट्र उवाच
ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा
न चाप्यर्थांश्चाददते परेभ्य:।
येषामदेयमर्हते नास्ति किंचित्
सर्वातिथ्या: सुप्रसादा जनाश्च॥ ३०॥
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्यान्
सत्रीभूता: सततं पुण्यशीला:।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | धृतराष्ट्र बोले - "महर्षि! जो सदा दान देते हैं, पर दान स्वीकार नहीं करते, जिनकी दृष्टि में सुपात्र के लिए कोई वस्तु अयोग्य नहीं है, जो सबको अतिथि के समान समझते हैं और सबके प्रति दयालु हृदय रखते हैं, जो क्षमाशील हैं और दूसरों को कभी कुछ नहीं कहते तथा जो पुण्यात्मा महात्मा सदा सबके लिए अन्नरूप में रहते हैं, ऐसे लोगों के लिए ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्र को वहाँ भी जाने की आवश्यकता नहीं है ॥30-31॥ | | | | Dhritarashtra said, "Maharshi! Those who always give alms but do not accept alms, in whose eyes nothing is undeserving for a deserving person, who treat everyone as guests and have a kind heart towards everyone, who are forgiving and never say anything to others and those virtuous Mahatmas who are always in the form of food for everyone, this Somaloka is only for such people; but Dhritarashtra does not have to go there either. ॥30-31॥ | | ✨ ai-generated | | |
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