श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.107.25-26 
गौतम उवाच
यत्रोत्तरा: कुरवो भांति रम्या
देवै: सार्धं मोदमाना नरेन्द्र।
यत्राग्नियौनाश्च वसंति लोका
अब्योनय: पर्वतयोनयश्च॥ २५॥
यत्र शक्रो वर्षति सर्वकामान्
यत्र स्त्रिय: कामचारा भवन्ति।
यत्र चेर्ष्या नास्ति नारीनराणां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये॥ २६॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "नरेन्द्र! मैं उस स्थान पर जाऊँगा जहाँ सुन्दर आकृति वाले उत्तर कुरु के निवासी असाधारण शोभा का आनंद लेते हैं, देवताओं का सान्निध्य प्राप्त करते हैं, जहाँ अग्नि, जल और पर्वतों से उत्पन्न दिव्य मनुष्य निवास करते हैं, जहाँ इन्द्र समस्त कामनाओं की वर्षा करते हैं, जहाँ स्त्रियाँ अपनी इच्छानुसार विचरण करने को स्वतंत्र हैं तथा जहाँ स्त्री-पुरुषों में ईर्ष्या का भाव नहीं है, वहाँ मैं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस ले लूँगा।" 25-26.
 
Gautama said, "Narendra! I will go to the place where the residents of Uttar Kuru with beautiful features enjoy extraordinary beauty, enjoy the company of the gods, where the divine humans born from fire, water and mountains live, where Indra showers all the desires, where the women are free to move about as they please and where there is absolutely no jealousy between men and women, I will go there and take back my elephant from you." 25-26.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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