श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.107.24 
धृतराष्ट्र उवाच
ये नृत्यगीते कुशला जना: सदा
ह्ययाचमाना: सहिताश्चरन्ति।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र॥ २४॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, 'महर्षि! यह नन्दनवन उन लोगों के लिए है जो नृत्य और गान में निपुण हैं, जो कभी किसी से कुछ नहीं मांगते तथा जो सदैव श्रेष्ठ लोगों के साथ विहार करते हैं; किन्तु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जाने वाले हैं।
 
Dhritarashtra said, 'Maharishi! This world of Nandanavan is for those people who are proficient in dance and song, who never beg for anything from anyone and who always move around with the noble people; but King Dhritarashtra is not going to go there either.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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