श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.107.17 
धृतराष्ट्र उवाच
ज्येष्ठां स्वसारं पितरं मातरं च
यथा शत्रुं मदमत्ताश्चरन्ति।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र॥ १७॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - महर्षि! यह यमराज का लोक उन मदोन्मत्त मनुष्यों के लिए है, जो अपनी बड़ी बहन, माता और पिता के साथ शत्रु के समान व्यवहार करते हैं, किन्तु धृतराष्ट्र वहाँ नहीं जा रहे हैं॥17॥
 
Dhritarashtra said - Maharshi! This world of Yamaraja is for those intoxicated people who treat their elder sister, mother and father like enemies, but Dhritarashtra is not going there.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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