श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.107.15 
धृतराष्ट्र उवाच
ये निष्क्रिया नास्तिकाश्रद्दधाना:
पापात्मान इन्द्रियार्थे निविष्टा:।
यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र॥ १५॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - जो लोग निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापी और इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हैं, वे ही यम की यातना को प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ जाना नहीं चाहते ॥15॥
 
Dhritarashtra said – Those who are inactive, atheist, faithless, sinful and attached to the objects of the senses, only they attain Yama's torture; But King Dhritarashtra does not want to go there. 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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