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श्लोक 13.107.14  |
गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा
यत्र प्रेत: शोचते पापकर्मा।
वैवस्वतस्य सदने महात्मं-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| गौतम बोले - महात्मन! मैं अपना हाथी आपसे यमराज के लोक में वापस ले लूँगा, जहाँ पुण्यात्मा मनुष्य सुखी होता है और जहाँ पापी मनुष्य दुःखी होता है॥14॥ |
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| Gautam said – Mahatman! I will take back my elephant from you in the world of Yamraj, where a virtuous person becomes happy and where a sinful person goes in sorrow. 14॥ |
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