श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.107.14 
गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा
यत्र प्रेत: शोचते पापकर्मा।
वैवस्वतस्य सदने महात्मं-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये॥ १४॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले - महात्मन! मैं अपना हाथी आपसे यमराज के लोक में वापस ले लूँगा, जहाँ पुण्यात्मा मनुष्य सुखी होता है और जहाँ पापी मनुष्य दुःखी होता है॥14॥
 
Gautam said – Mahatman! I will take back my elephant from you in the world of Yamraj, where a virtuous person becomes happy and where a sinful person goes in sorrow. 14॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas