श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.107.13 
धृतराष्ट्र उवाच
ब्राह्मणानां हस्तिभिर्नास्ति कृत्यं
राजन्यानां नागकुलानि विप्र।
स्वं वाहनं नयतो नास्त्यधर्मो
नागश्रेष्ठं गौतमास्मान्निवर्त॥ १३॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतम! ब्राह्मणों को हाथियों से कोई प्रयोजन नहीं। हाथियों के समूह तो केवल राजाओं के काम आते हैं। हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथी को लेने में कोई पाप नहीं है। कृपया इससे अपना लोभ दूर कीजिए॥13॥
 
Dhritarashtra said, "O great Brahmin Gautama! Brahmins have no use for elephants. Groups of elephants are useful only to kings. The elephant is my vehicle, hence there is no sin in taking this great elephant. Please remove your greed from it. ॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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