श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.107.12 
गौतम उवाच
तवैव गावो हि भवन्तु राजन्
दास्य: सनिष्का विविधं च रत्नम्।
अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र
किं ब्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
गौतम बोले, "हे राजन! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्ण मुद्राएँ, नाना प्रकार के रत्न और अन्य प्रकार की सम्पत्तियाँ आपके पास ही रहनी चाहिए। हे प्रभु! ब्राह्मण के घर में धन का क्या उपयोग है?"
 
Gautama said, "O King! Those cows, maids, gold coins, various kinds of gems and other kinds of wealth should remain with you. O Lord! What is the use of wealth in a Brahmin's house?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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