श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 107: भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.107.11 
धृतराष्ट्र उवाच
गवां सहस्रं भवते ददानि
दासीशतं निष्कशतानि पञ्च।
अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे
किं ब्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "महर्षि! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा। सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ दूँगा तथा अनेक प्रकार की सम्पत्तियाँ भी दान करूँगा। ब्राह्मण के घर हाथी का क्या काम?"
 
Dhritarashtra said, "Maharishi! I will give you a thousand cows. I will give you a hundred maids and five hundred gold coins and will also donate many types of wealth. What use is an elephant in a Brahmin's house?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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