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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 106: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मस्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति
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श्लोक 23
श्लोक
13.106.23
अहं हि पापयोन्यां वै प्रसूत: क्षत्रियर्षभ।
निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत॥ २३॥
अनुवाद
हे क्षत्रियश्रेष्ठ! मैं पापों की योनि में जन्मा हूँ। मैं यह निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ कि किस उपाय से मेरी मुक्ति हो सकती है॥23॥
O great Kshatriya! I was born in the womb of sins. I am unable to decide by what means I can be freed.॥23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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