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mahabharat 13.104.26: तुम्हारे प्रति किए गए इस अत्याचार से मैं अत्यन्त क्षुब्ध होकर उस पापी, ब्राह्मणद्रोही, धर्म का उल्लंघन करने वाले को क्रोधपूर्वक शाप दूँगा कि ‘तू सर्प हो जा’॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 13.104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 104: नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  13.104.26 
व्युत्क्रान्तधर्मं तमहं धर्षणामर्षितो भृशम्।
अहिर्भवस्वेति रुषा शप्स्ये पापं द्विजद्रुहम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे प्रति किए गए इस अत्याचार से मैं अत्यन्त क्षुब्ध होकर उस पापी, ब्राह्मणद्रोही, धर्म का उल्लंघन करने वाले को क्रोधपूर्वक शाप दूँगा कि ‘तू सर्प हो जा’॥ 26॥
 
Being filled with great resentment at this atrocity committed against you, I will angrily curse that sinner, traitor to the Brahmins, who have violated the Dharma, saying, 'You become a serpent.'॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)