Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.102.21-22h: श्री कृष्ण! गृहस्थ को सदैव यज्ञ के लिए बनाया हुआ भोजन ही खाना चाहिए। राजा, ऋत्विज, स्नातक, गुरु और ससुर - यदि वे एक वर्ष के बाद घर आते हैं, तो मधुपर्क से उनकी पूजा करनी चाहिए। 21 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.102: गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 102: गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  13.102.21-22h 
गृहस्थ: पुरुष: कृष्ण शिष्टाशी च सदा भवेत्।
राजर्त्विजं स्नातकं च गुरुं श्वशुरमेव च॥ २१॥
अर्चयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान्।
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! गृहस्थ को सदैव यज्ञ के लिए बनाया हुआ भोजन ही खाना चाहिए। राजा, ऋत्विज, स्नातक, गुरु और ससुर - यदि वे एक वर्ष के बाद घर आते हैं, तो मधुपर्क से उनकी पूजा करनी चाहिए। 21 1/2॥
 
Sri Krishna! A householder should always eat only food prepared for Yagya. King, Ritvij, graduate, guru and father-in-law - if they come home after a year, then they should be worshiped with Madhupark. 21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)