श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 102: गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.102.10 
अग्नीषोमं वैश्वदेवं धान्वन्तर्यमनन्तरम्।
प्रजानां पतये चैव पृथग्घोमो विधीयते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
पहले अग्नि और सोम को, फिर विश्वदेवता को, फिर धन्वन्तरि को और फिर प्रजापति को अलग-अलग आहुति देने का विधान है ॥10॥
 
There is a rule to offer separate offerings first to Agni and Soma, then to Vishwadevata, then to Dhanvantari and then to Prajapati. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)