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mahabharat 13.100.d7: इन्द्र बोले, 'माताले! मैं उन लोगों को नमस्कार करता हूँ जिनकी बुद्धि धर्म, अर्थ और काम का चिन्तन करते हुए भी पापों में प्रवृत्त नहीं होती।'   |   mahabharat अध्याय 13.100: सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं—इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 100: सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं—इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद  »  श्लोक d7
 
 
श्लोक  13.100.d7 
इन्द्र उवाच
धर्मं चार्थं च कामं च येषां चिन्तयतां मति:।
नाधर्मे वर्तते नित्यं तान् नमस्यामि मातले॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र बोले, 'माताले! मैं उन लोगों को नमस्कार करता हूँ जिनकी बुद्धि धर्म, अर्थ और काम का चिन्तन करते हुए भी पापों में प्रवृत्त नहीं होती।'
 
Indra said, 'Matale! I salute those whose intellect never gets involved in sins, even while thinking about Dharma, Artha and Kama.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)