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श्लोक 13.10.58  |
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम्।
मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम्॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| विप्रेन्द्र! यह काल का फेर तो देखो कि मैं शूद्र से राजा बना और मुझे उपदेश देने के कारण ही तुम्हें यह पुरस्कार मिला ॥58॥ |
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| Viprendra! Look at this twist of time that from a shudra I became a king and because of preaching to me you got this reward. ॥ 58॥ |
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