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mahabharat 13.10.35-37: हे प्रिय बंधु! इसी प्रकार उस ऋषि ने भी समयानुसार मृत्यु को प्राप्त किया। हे भरतश्रेष्ठ! उसी ऋषि ने अगले जन्म में उसी वंश के एक पुरोहित के कुल में जन्म लिया। इस प्रकार वह शूद्र और वह ऋषि दोनों वहीं जन्मे, क्रमशः बड़े हुए और सभी प्रकार की विद्याओं में निपुण हो गए।   |   mahabharat अध्याय 13.10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा  »  श्लोक 35-37
 
 
श्लोक  13.10.35-37 
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह॥ ३५॥
पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ।
एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा॥ ३६॥
क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिय बंधु! इसी प्रकार उस ऋषि ने भी समयानुसार मृत्यु को प्राप्त किया। हे भरतश्रेष्ठ! उसी ऋषि ने अगले जन्म में उसी वंश के एक पुरोहित के कुल में जन्म लिया। इस प्रकार वह शूद्र और वह ऋषि दोनों वहीं जन्मे, क्रमशः बड़े हुए और सभी प्रकार की विद्याओं में निपुण हो गए।
 
O dear brother! Similarly, that sage also attained death according to the time. O best of Bharatas! That same sage was born in the family of a priest of the same dynasty in his next birth. Thus, that Shudra and that sage both were born there, grew up gradually and became proficient in all kinds of knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)