श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.1.2 
अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह।
स्वकृते का नु शान्ति: स्याच्छमाद् बहुविधादपि॥ २॥
 
 
अनुवाद
दादाजी महाराज! आपने इस विषय में शांति के अनेक उपाय बताए, परंतु इन विविध शांति के उपायों को सुनने पर भी अपने द्वारा किए गए अपराध से मन को शांति कैसे प्राप्त हो सकती है? 2॥
 
grandfather Sir! You told many ways of peace in this matter, but even after listening to these various ways of peace, how can the mind attain peace from the crime committed by oneself? 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)