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mahabharat 12.91.55: राजा को सदैव सावधान रहना चाहिए। उसे अपनी तथा अपने शत्रु की कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए तथा यह प्रयास करना चाहिए कि शत्रु उसकी कमजोरियों को स्पष्ट रूप से न देख सके; किन्तु यदि उसे अपने शत्रु की कमजोरियों का पता चल जाए, तो उस पर आक्रमण कर देना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.91.55 
अप्रमत्तो भवेद् राजा छिद्रदर्शी परात्मनो:।
नास्यच्छिद्रं पर: पश्येच्छिद्रेषु परमन्वियात्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
राजा को सदैव सावधान रहना चाहिए। उसे अपनी तथा अपने शत्रु की कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए तथा यह प्रयास करना चाहिए कि शत्रु उसकी कमजोरियों को स्पष्ट रूप से न देख सके; किन्तु यदि उसे अपने शत्रु की कमजोरियों का पता चल जाए, तो उस पर आक्रमण कर देना चाहिए।
 
A king should always be cautious. He should look for his own weaknesses as well as those of his enemy and try to ensure that the enemy is not able to see his weaknesses clearly; but if he comes to know of the weaknesses of his enemy, he should attack him. 55.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)