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mahabharat 12.91.35: यदि परमप्रिय व्यक्ति भी कर्म या वाणी से पाप करे, तो राजा को उसे क्षमा नहीं करना चाहिए, अर्थात् उसे यथायोग्य दण्ड देना चाहिए। इस प्रकार का आचरण राजा का धर्म कहलाता है ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 91: उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.91.35 
पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा।
प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
यदि परमप्रिय व्यक्ति भी कर्म या वाणी से पाप करे, तो राजा को उसे क्षमा नहीं करना चाहिए, अर्थात् उसे यथायोग्य दण्ड देना चाहिए। इस प्रकार का आचरण राजा का धर्म कहलाता है ॥35॥
 
If even the most beloved person commits a sin through action or speech, then the king should not forgive him, that is, he should punish him as per his due punishment. This kind of behavior is called the religion of a king. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)